अक्टूबर 22, 2021

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कौरवों की बहन दुशाला

कौरवों की बहन दुशाला
गांधारी की एक बेटी की भी इच्छा थी। यह इच्छा ऋषि व्यास के वरदान से पूरी हुई। इस तरह, गांधारी सौ कौरव और दुशाला की मां बन गई। और दुशाला सौ कौरवों की इकलौती बहन हो गई।

दोस्तो, आज मैं महाभारत के एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बात करना चाहता हूं, जो कौरवोंकी सबसे करीबी रिशेदार थी, पर उसका ज्यादा उल्लेख नहीं है। सब जानते हैं के महाभारत के अनुसार, कुरु वंश ने हस्तिनापुर पर शासन किया। एक व्यक्तिती है दुशाला, जो गंधारी और धृतराष्ट्र की इकलौती बेटी थी। सौ कौरवों में से, दुर्योधन और दुशासन को छोडकर, अट्ठानबे अन्य कौरव और दुशाला का महाकाव्य में बहुत कम उल्लेख है।

ऋषि व्यास और गांधारी

ऋषि व्यास के वरदान के साथ गांधारी सौ पुत्रों की मां बन गई। लेकिन गांधारी की एक बेटी की भी इच्छा थी। यह इच्छा ऋषि व्यास के वरदान से पूरी हुई। इस तरह, गांधारी सौ कौरव और दुशाला की मां बन गई। और दुशाला सौ कौरवों की इकलौती बहन हो गई।

दुशाला

दुशाला की परवरिश के ज्यादा संदर्भ नहीं हैं। केवल एक की, वो पितामह भीष्म की शिक्षा और मार्गदर्शन में पली-बड़ी। परिवार की इकलौती बेटी होने की वजह से, परिवार के भितर उसका बचपन खुशीयों से भरा हुआ था। कुछ संदर्भ हैं की, अन्य कौरवों की तरह वो पांडोवों से नफ़रत नहीं करती थी। बचपन में उसे पांडवों के प्रति प्रेम और सद्भाव था।

दुशाला की शादी

उसका वैवाहिक जीवन शायद इतना सुखादयी नहीं था। उसका विवाह सिंधु साम्राज्य के राजा, जयद्रथ से किया गया। कुछ विद्वान यह सवाल करते हैं की दुर्योधन ने अपने करीबी दोस्त कर्ण से दुशाला की शादी क्यों नहीं की? संभव: दुर्योधन का है इस फैसले में कोई सहभाग ना ​​हो। या,  यह विवाह तब हुआ, जब वे छोटे थे और कर्ण से मित्रता नहीं हुई होगी ।

दुर्योधन और कर्ण

आदि पर्व में एक सन्दर्भ है की, धृतराष्ट्र ने सावधनी पूर्वक, सोच समाज कर दुशाला का गठबंधन तय किया। संभवत: शकुनि के साथ परामर्श किया हो, जिनके पास बड़ी राजनीतिक दूरदृष्टि थी। उन दिनों राजघरानों में विवाहों को एक राजनीतिक पृष्ठभूमि हुआ करती थी। जयद्रथ से रिश्ता जोड़ने का संभवत: कारण यह हो सकता है कि, जयद्रथ सिंधु नरेश होने के अलावा, मगध, मद्र, गांधार जैसे शक्तिशाली साम्राज्यों के मित्र भी थे।

, जयद्रथ की दो अन्य पत्नियां

एक संदर्भ है कि, दुशाला के अलावा, जयद्रथ की दो अन्य पत्नियां थीं। एक गांधार साम्राज्य से और दुसरी कम्बोज साम्राज्य से। वह द्रौपदी के प्रति भी आकर्षित था। पांडवों के वनवास के दौरान, जयद्रथ ने द्रौपदी का अपहरण कर लिया क्योंकि, वह उससे शादी करना चाहता था।

जयद्रथ का सिर मुंडवाकर वापस भेज दिया

हालांकि, पांडवों ने जयद्रथ का पीछा किया और उसे पकड़ लिया। भीम जयद्रथ को उसके दुस्साहस के लिए मारना चाहता था। लेकिन, द्रौपदी ने पांडवों को उनकी बहन दुशाला की याद दिला दी, जो विधवा हो जाएगी। इसलिए पांडवों ने उन्हें अपनी बहन दुशाला के लिए बख्शा। भीम ने दंड स्वरूप जयद्रथ का सिर मुंडवाकर वापस भेज दिया।

शकुनि

एक संदर्भ है कि, जयद्रथ ने खुशी-खुशी दुशाला को पांडवों के बुरे अपमान के बारे में बताया, जिसका उन्हें द्युतक्रीडा हारने के बाद सामना करना पड़ा था। दरअसल कौरवों की ओर से खेल रहे शकुनि ने उन्हें फंसा लिया। लेकिन पांडवों ने जो कीमत चुकाई, उसके बारे में सुनकर दुशाला को दुख हुआ।

जयद्रथ का वध

सभी जानते हैं कि अर्जुन ने कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में जयद्रथ का वध किया था। जयद्रथ की मृत्यु के बाद दुशाला के पुत्र सूरध को सिंधु का राजा बनाया गया। उन्होंने राजमाता दुशाला के मार्गदर्शन में कुछ वर्षों तक सिंधु राज्य पर शासन किया।

अश्वमेध यज्ञ

कुरुक्षेत्र युद्ध के कुछ साल बाद, पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। सभी छोटे राज्यों को एक मजबूत राष्ट्र में एकजुट करने के लिए इसकी व्यवस्था की गई थी। अश्वमेध घोड़ा पांडवों की सेना के साथ सिंधु राज्य पहुंचा। सिंधु साम्राज्य की सेना ने जयद्रथ की मृत्यु का बदला लेने के लिए पांडवों की सेना के साथ भीषण युद्ध किया। लेकिन, उनकी हार तय थी। इसी बीच पांडव और उनकी सेना के आने की खबर से सूरध डर के मारे बेहोश हो गया और उसमें उसकी मौत हो गई।

दुशाला युद्ध के मैदान में

इसके बाद की घटनाओं के बारे में दो परस्पर विरोधी संदर्भ मिलते हैं, एक में एक दुशाला पांडव की सेना का सामना करने के लिए युद्ध के मैदान में जाती है, लेकिन अर्जुन उसके साथ शांति बनाने के लिए बिना किसी हथियार के दुशाला की सेना के सामने जाता है। अन्य संदर्भों के अनुसार, सूरथ की मृत्यु के बाद, दुशाला पोते के साथ युद्ध के मैदान में जाती है और सुरथ की मृत्यु की खबर देकर युद्ध को रोक देती है

अर्जुन और दुशाला

। पांडव इस खबर से कांप जाते हैं और अपनी बहन और अपने भतीजे की मौत के लिए खेद महसूस करते हैं। वे न केवल युद्ध रोकते हैं, बल्कि अपनी बहन को उसके बेटे की मौत पर सांत्वना देते हैं। जाने से पहले वे उसके पोते को सिंधु राज्य के शासक के रूप में राज्याभिषेक करते हैं। इस तरह, उन्होंने अश्वमेध यज्ञ के साथ की गई एकीकरण प्रक्रिया से सिंधु साम्राज्य को भी बख्शा।