अक्टूबर 21, 2021

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प्रभु राम के पूर्वज राजा दिलीप

राम के पूर्वज
राजा दिलीप के पुत्र रघु, राजा रघु के पुत्र अजा थे और अजा के पुत्र भगवान राम के पिता, राजा दशरथ थे। वे सभी अपने समय में अजेय थे। वे अपनी प्रजा से सम्मानित और प्रिय थे। उन्होंने अपने लिए उच्च नैतिक मानक निर्धारित किए और उनके लिए जिए। उनके राजवंश में, इस परंपरा का पालन सभी ने किया, विशेष रूप से भगवान राम और राजा हरिश्चंद्र ने।

रामायण महाकाव्य में, राजा दशरथ भगवान राम के पिता थे। उन्होंने उचित समय पर राम के राज्याभिषेक की घोषणा की। इस शुभ अवसर के लिए पूरी अयोध्या तैयार हो गई। कैकेयी भरत की माँ और राम की सौतेली माँ थीं।

अविवेकी कैकेयी

उस राज्याभिषेक की पूर्व संध्या पर, अविवेकी कैकेयी ने राजा दशरथ को उनके द्वारा दिए गए दो वरदानों की याद दिलाई। उसने अपने बेटे भरत के लिए राज्य की मांग की और भगवान राम के लिए चौदह साल का वनवास। हैरान हुये राजा दशरथ ने उससे कुछ और माँगने की बड़ी विनती की। लेकिन कैकेयी नहीं मानी. कैकेयी ने उससे कहा कि, वह चाहे तो अपना वादा तोड़ सकते है।

उस समय दशरथ ने उसे कहा, रघुकुल रीते सदा चली आयी, प्राण जाए पर वचन न जाई (इसका मतलब है के, यह रघु वंश की एक परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है, कि, एक बार दिए गए शब्दों को हमेशा सम्मानित किया जाएगा, उसके लिए चाहे प्राण क्यों न त्यागने पड़े)। आखिरकार, जैसे ही भगवान राम वनवास के लिए रवाना हुए, राम के वियोग से राजा दशरथ की मृत्यु हुई। राजा दशरथ का वह वाक्य सभी मानवजाति के लिए एक मार्गदर्शक तत्व: बन गया।

राजा दशरथ की मृत्यु

आइए भगवान राम के पूर्वजों की कहानी पर चर्चा करते हैं, जिन्होंने न केवल हिंदुओं के लिए, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए यह महान जीवन का पाठ अर्पित किया।

राजा दिलीप और सुदक्षिणा

वाल्मीकि रामायण और विष्णु पुराण में सूर्यवंश के राजाओं के संदर्भ मिलते हैं। भगवान राम के परदादा राजा दिलीप एक सम्मानित और प्रिय राजा थे। इसके बावजूद, वे दुखी थे। उनके दुख का कारण यह था कि उनकी और उनकी पत्नी सुदक्षिणा की कोई संतान नहीं थी। एक बार, उन्होंने मार्गदर्शन के लिए ऋषि वशिष्ठ से मिलने का फैसला किया।

राजा दिलीप और सुदक्षिणा ऋषि वशिष्ठ से मिलने उनके आश्रम में गए

उसके अनुसार, राजा दिलीप और सुदक्षिणा ऋषि वशिष्ठ से मिलने उनके आश्रम में गए और उन्हें उनके दुख का कारण बताया। तभी कुछ समय अंतरमुख होने पश्चात, ऋषि ने उन्हें बताया कि, दिव्य गाय सुरभि द्वारा उन पर लगाया गया एक श्राप, उनकी संतानहीनता का कारण है।

नवविवाहित राजा दिलीप और सुदक्षिणा

उन्होने आगे बताया की जभी राजा और सुदक्षिणा, नवविवाहित थे, सुरभि गाय के पास से गुजर रहे थे, जो उन्हें आशीर्वाद देने के लिए उत्सुक थी । हालांकि, वे आपस में इतने तल्लीन थे कि उन्होंने गाय को नजरअंदाज कर दिया। दुखी होकर सुरभि गाय ने उन्हें श्राप दिया कि जब तक वे उसकी संतान की सेवा नहीं करेंगे, तब तक उन्हें कभी संतान नहीं होगी।

सुरभि गाय

अपनी अनजाने में हुई गलती का एहसास होने के बाद, राजा दिलीप ने ऋषि से प्रायश्चित के बारे में पूछा। ऋषि वशिष्ठ ने उनसे कहा कि, उन्हें सुरभि गाय की बेटी नंदिनी की देखभाल करनी चाहिए, जो उनके आश्रम में ही थी।

सुदक्षिणा सुबह गाय की पूजा करते

प्रायश्चित के लिए, राजा और उसकी पत्नी आश्रम में रहने लगे। राजा ने ऋषि को आश्वासन दिया कि वह हर दिन जंगल में नंदिनी गाय की देखभाल करेगा। हर दिन, राजा दिलीप और सुदक्षिणा सुबह गाय की पूजा करते और उसे जंगल में ले जाते। वे शाम तक उसके लिए जंगल के बाहर इंतजार करते। वे उसे शाम को आश्रम वापस ले आते। ऐसा इक्कीस दिनों तक चलता रहा। बाईसवें दिन, नंदिनी ने राजा दिलीप की वीरता का परीक्षण करने का फैसला किया।

नंदिनी भगवान शिव के संरक्षित वन में

वह जंगल से भटकती हुई, हिमालय की पहाड़ियों में भगवान शिव के संरक्षित वन में पहुंच गई। फिर भी, राजा दिलीप ने सोचा कि गाय की पवित्रता उसकी रक्षा करेगी और उसने उसे रोका नहीं। जब वह शिव के संरक्षित जंगल में थी, तब राजा उसके चारों ओर प्रकृति के वैभव को देख रहा था। अचानक उन्हें गाय का रंभाना सुनाई दिया। तो वह उस दिशा की ओर भागा। उसने पाया कि, एक शेर ने उसे अपने पंजों से जक्कड़ लिया था। गाय भयभीत दिखी। राजा ने उसे आश्वासन दिया कि, वह उसकी रक्षा के लिए शेर को मार देगा। उसने अपना हाथ अपने धनुष की ओर बढ़ाया। लेकिन, अपनी बाहों को जमी हुई देखकर वह चौंक गया। लगभग उसी समय, राजा को आश्चर्य हुआ, क्योंकि शेर ने बोलना शुरू कर दिया था। उन्होंने राजा को बताया कि भगवान शिव ने उन्हें संरक्षित वन की रक्षा के लिए तानत किया था, जिसका नंदिनी ने उल्लघन किया था। इसलिए, उसे मरना होगा। शेर ने दिलीप को यह भी बताया कि, उसि ने राजा पर एक जादू कर दिया था जिसके चलते उसे भुजा जम गई थी ।

राजा दिलीप ने शेर से गाय को छोड़ने और उसके बदले उसे मारने का अनुरोध किया। चूंकि उसने भी उल्लघन किया था। शेर ने उसे बताया कि, राजा गाय को बचाने उस संरक्षित वन में आया था, जिस तरह एक बेटा अपनी मां के पीछे आता है, इस लिए वह राजा को नहीं मार सकता है । राजा ने तर्क दिया कि यदि वह नंदिनी के बिना आश्रम जाता है, तो वह ऋषि वशिष्ठ का सामना नहीं कर पाएगा। क्यों की राजा ने ऋषि को नंदिनी की रक्षा का वचन दिया था।

राजा दिलीप शेर के सामने झुक गया

शेर ने आगे तर्क दिया कि राजा अपनी प्रजा के रक्षक है और उसका जीवन गाय की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है। राजा ने उत्तर दिया कि, उनके लिए, लोगों से किया गया उनका वादा, उनके जीवन से अधिक महत्वपूर्ण है। उनके वादे उनकी प्रतिष्ठा से जुड़े थे और उनके चले जाने के बाद भी उनकी प्रतिष्ठा जीवित रहेगी। इसलिए, शेर को गाय को छोड़ देना चाहिए और उसे मार देना चाहिए। अंत में, शेर सहमत हो गया। और जादू टूट गया। राजा दिलीप हिल सकता था। इसलिए, उसने अपने हथियार फेंक दिए और वह शेर के सामने झुक गया। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और शेर के पंजे से मौत का इंतजार करने लगा।

अचानक उसे एक मीठी आवाज़ सुनाई दी, जिसने उसे उठने के लिए कहा। राजा ने देखा कि शेर गायब हो गया था और नंदिनी उसके सामने खड़ी थी। वह हैरान था। नंदिनी ने उसे बताया कि, राजा वशिष्ठ की आध्यात्मिक शक्ति उसकी रक्षा करती है। उसने आगे बताया कि, उसने राजा की वीरता का परीक्षण करने के लिए शेर का भ्रम पैदा किया था और वह उसकी भक्ति से प्रसन्न थी। उसने उसे एक वीर पुत्र का वरदान दिया ।

राजा दिलीप, सुदक्षिणा और पुत्र रघु

कुछ दिनों के बाद, राजा अपनी पत्नी समेत अपने महल के लिए रवाना हुआ। नियत समय में सुदक्षिणा ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम रघु रखा गया।  राजा रघु के पुत्र अजा थे और अजा के पुत्र भगवान राम के पिता, राजा दशरथ थे। वे सभी अपने समय में अजेय थे। वे अपनी प्रजा से सम्मानित और प्रिय थे। उन्होंने अपने लिए उच्च नैतिक मानक निर्धारित किए और उनके लिए जिए। उनके राजवंश में, इस परंपरा का पालन सभी ने किया, विशेष रूप से भगवान राम और राजा हरिश्चंद्र ने।